Indira Gandhi death anniversary: एक इंटरव्यू, जिसमें इंदिरा गांधी का अंदाज, उनकी शैली और उनकी गंभीरता बताती है कि क्यों उन्हें " Iron lady" कहा जाता था
नई दिल्ली. देश की पूर्व प्रधानमंरत्री इंदिरा गांधी की आज पुण्यतिथि है. 36 साल पहले यानी की 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी के ही बॉडीगार्ड बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी. इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने उन्हें सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी है. इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा की थी.
इसके बाद नागरिक अधिकारों को कुचल कर रख दिया गया था और बड़े पैमाने पर विपक्षी नेताओं और जनता को जेलों में भेज दिया गया था. उस वक्त देश में बड़े पैमाने पर कई गिरफ्तारियां हुई. इतना ही नहीं प्रेस की आजादी तक छीन ली गई थी. जानकारी के मुताबिक तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इंदिरा गांधी के कहने पर ही संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी.
- All india radio और BBC
70 और 80 के दशक में सोशल मीडिया तो छोड़िएं. सैटेलाइट चैनल का भी नामोनिशान तक नहीं था. भारत के मुख्य संचार माध्यमों में अखबार, ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन और BBC का बोलबाला था. आज की पीढ़ी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जीवन की गाथा को किताबों, कहानियों, किस्सों और उनके साक्षात्कारों में ही सुना है. ऐसे ही एक साक्षात्कार में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू करने के पीछे अपना तर्क बताया था. देश में आपातकाल लागू करने के लिए इंदिरा गांधी ने बिना अफसोस जताते हुए कहा था कि "उस वक्त ऐसा करना देश की सुरक्षा के लिए जरूरी बन गया था, अन्यथा भारत के टूटने का खतरा था."
- 1977 का चुनाव हार चुकी थीं इंदिरा
1978 में इंदिरा गांधी ने एक इंटरव्यू दिया था जो काफी चर्चित रहा था, लेकिन इससे पहले ही इंदिरा गांधी 1977 का आम चुनाव हार चुकी थीं और उस वक्त मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री थे. इंदिरा का इंटरव्यू लिया था ब्रिटिश पत्रकार थेम्स टीवी के जोनाथन डिंबलबाए ने. इस इंटरव्यू में इंदिरा गांधी का अंदाज, उनकी शैली और उनकी गंभीरता बताती है कि क्यों उन्हें आयरन लेडी कहा जाता है.
इंदिरा से जब पत्रकार जोनाथन ने पहला सवाल पूछा कि... आखिर आपातकाल लागू करने से पहले आपको किस तरह के साजिश का आभास हुआ था. तो इसके जवाब में इंदिरा ने कहा "ये साफ है कि पूरे उप-महाद्वीप को अव्यस्थित कर दिया गया है. इसे बाहरी ताकतों का समर्थन हासिल था. सवाल ये है कि अगर ये सिर्फ आंतरिक उथल-पुथल होता तो इसे ज्यादा आसानी से निपटा जा सकता था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एंजेंसियां सक्रिय थीं. आज जो हो रहा है, इस शक हमें पहले से ही था."
- जानना मेरी जिम्मेदारी है
इंटरव्यू में जब इंदिरा से दूसरा सवाल पूछा गया कि... आखिर आपकी खुफिया एजेंसियों, आपके गृह मंत्री ने आपको किस तरह की जानकारी दी जो आपने आपातकाल लगाया. इंदिरा ने पत्रकार जोनाथन के सवाल का जवाब देते हुए कहा "वो क्या मुझे कहेंगे ये इसके बारे में नहीं है, मैं प्रधानमंत्री हूं, जानना मेरी जिम्मेदारी है और सारी जानकारियां पुलिस से ही नहीं आती हैं, और दूसरे स्रोतों से भी आती हैं, लेकिन उन्होंने भी इस तरह की रिपोर्ट दी थी."
- 1976 के चुनाव में आसानी से जीत जाती- इंदिरा
बताते चले कि शाह कमीशन की रिपोर्ट को एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए इंदिरा गांधी ने कहा था कि "क्या एक संसदीय लोकतंत्र में एक जज संसद के फैसले को पलटने की योग्यता रखता है." मैंने जो फैसला लिया था उसे कैबिनेट ने और संसद ने स्वीकृति दी थी, न सिर्फ से इसे स्वीकार किया गया था बल्कि पूरे देश में इसकी तारीफ की गई थी. यदि हम 1976 में चुनाव करवा दिए होते तो हम आसानी से जीत जाते, लेकिन अर्थव्यवस्था की हालत खराब थी, इसलिए हमने ऐसा नहीं किया.' आपको बता दें कि शाह कमीशन आपातकाल के समय की गयी ज्यादतियों की जांच के लिए जनता पार्टी सरकार द्वारा 1977 में बनाएं गए थे.
इंदिरा ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि 'उस वक्त हम जिन आर्थिक नीतियों पर चल रहे थे, अगर ये जारी रहीं तो हम भारत को एक मजबूत अर्थव्यवस्था दे सकते थे, यदि हम उसी समय चुनाव करवाते तो ये संभव नहीं था. इसलिए हमने अपने राजनीतिक भविष्य को खतरे में डाला और भारत को आर्थिक स्थिरता देने का फैसला किया, बजाय इसके कि हमने चुनावों की चिंता की.'
इंटरव्यू में पत्रकार जोनाथन डिंबलबाए ने इंदिरा से तीखा सवाल करते हुए कहा... मोरारजी देसाई को, जो कि बाद में भारत के पीएम बने, जेल में डालने की क्या जरूरत आ पड़ी थी, क्या वो भारत के लिए आर्थिक खतरा बन गए थे. इंदिरा ने इस सवाल के जवाब में बिना एक क्षण गंवाए कहा "नहीं...क्योंकि ये ही लोग थे जो लोकतंत्र को नष्ट कर रहे थे."
- 'प्रधानमंत्री के घर को घेरने जा रहे हैं'
इस पर जोनाथन ने हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर कैसे? इंदिरा ने कहा "...क्योंकि उन्हें महसूस होने लगा था कि वे चुनाव नहीं जीत सकते हैं, उन्होंने कहा कि हम इस जंग को गलियों में ले जाएंगे... मिस्टर मोरारजी देसाई ने एक इंटरव्यू में ऑन रिकॉर्ड कहा था कि हमलोग प्रधानमंत्री के घर को घेरने जा रहे हैं... हम लोग संसद को घेरने जा रहे हैं, हमलोग ये सुनिश्चित करेंगे कि संसद में कोई काम न हो... न तो प्रधानमंत्री बाहर आ सकें... न ही कोई अंदर जा सके..." इंदिरा ने आगे कहा कि "विपक्ष के एक दूसरे नेता ने तो यहां तक कहा था कि अगर हम बैलेट से नहीं जीत सके तो हम बुलेट से जीतेंगे."
इंदिरा के जवाब पर पत्रकार जोनाथन ने दुबारा पूछा कि.. आपने पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया, अगर वे कानून तोड़ रहे थे तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया? इस पर इंदिरा दो टूक कहा कि "भारत ब्रिटेन जैसा एक छोटा सा देश नहीं है, ये एक बहुत बड़ा देश है और यहां की समस्याएं जटिल हैं, पूरे देश में इन लोगों ने अनुशासनहीनता की चरमसीमा का माहौल बनाकर रख दिया था... यहां एक तरह का नॉन फंक्शनल अनार्की (अराजकता) पैदा हो गई थी. अगर उस वक्त हमलोग इसे नहीं रोकते तो भारत नहीं बचा रहता... दुर्भाग्य से मौजूदा सरकार का कामकाज भारत को फिर से उसी रास्ते पर ले जा रहा है...सिर्फ एकमात्र अंतर यह है कि उस वक्त हमने एक अच्छी अर्थव्यवस्था दी थी इसलिए ये सरकार अबतक चल रही है."
- उस वक्त युद्ध जैसी ही स्थिति थी
आपातकाल के समय नागरिक अधिकारों को छीन लिए जाने पर इंदिरा ने कहा कि 'युद्धकाल के समय कई सारे राजनीतिक अधिकार और नागरिक अधिकार लोगों से ले लिए जाते हैं, और भारत के लिए ये समय उतना ही गंभीर था जितना कि एक युद्धकाल... क्योंकि ये हमारे अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गया था.'
- 'मैंने इमरजेंसी लगाई, मैंने ही वापस ली'
प्रेस की आजादी छीने जाने पर लगे सेंसरशिप का जवाब देते हुए इंदिरा गांधी ने इंटरव्यू में कहा था कि "उस समय हालात काबू से बाहर जा रहे थे और कुछ प्रतिबंध जरूरत हो गए थे. इंदिरा ने कहा कि विकासशील देशों में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र था जिसने शांतिपूर्ण तरीके से सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने की कोशिश की. जब इन तरीकों को खतरा हुआ तो हमने अल्पकालिक कदम उठाए. मैंने आपातकाल की घोषणा की थी, लेकिन वो मैं ही हूं जिसने इमरजेंसी को वापस लिया. मैंने चुनाव करवाए... मैं नहीं समझती हूं कि दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई एक भी उदाहरण है."
- 'आज भी तो आपातकाल जैसी स्थिति है'
1978 के सामाजिक-राजनीतिक हालत का जिक्र करते हुए इंदिरा गांधी ने कहा था कि "आज भी आपातकाल जैसे हालात हैं. भले ही ये संवैधानिक नहीं है, वैध नहीं है, इसे संसद की स्वीकृति हासिल नहीं है, लेकिन हर दूसरे पहलू पर आज इमरजेंसी जैसे ही हालात हैं." इंदिरा गांधी से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि... क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ कि आपने किसी भी तरह से उस विश्वास का दुरुपयोग किया है जो भारत के लोगों ने आप में जताया है. तो इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने अफसोस जताए कहा कि "उन्हें ऐसा कभी नहीं लगता है."
आपको बता दें कि देश में 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक आपातकाल लागू रहा. इसके बाद इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा की. इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.
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